डॉ अजय आर्य बोले आदमी स्वार्थी है। वह काटने की सोचता है और लेने की सोचता है। जो देने की सोचते हैं वे देवता बन जाते हैं।
डॉ अजय आर्य बोले आदमी स्वार्थी है। वह काटने की सोचता है और लेने की सोचता है। जो देने की सोचते हैं वे देवता बन जाते हैं।
अगर आप विनम्र नहीं है तो आप विद्वान भी नहीं हैं। उदय कॉलेज में मूल्य शिक्षा कार्यक्रम
जीवन मूल्यों को पोषित करने के लिए दिए पांच मंत्र
*जिसके जीवन में मूल्य है , उसका जीवन अमूल्य हो जाता है: आचार्य डॉ. अजय आर्य*
मूल्य शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत आज सुप्रसिद्ध वैदिक विद्वान आचार्य डॉ. अजय आर्य का उदय कॉलेज में व्याख्यान आयोजित किया गया।
कार्यक्रम के पूर्व चरण में डायरेक्टर तर साहू प्रिंसिपल डॉक्टर अलिपा साहू विभाग अध्यक्ष डॉ. कलावती राव ने दीप प्रचलन करके माता विद्या देवी सरस्वती की पूजा अर्चना की।
प्राचार्य डॉ. एलिपा साहू विभाग अध्यक्ष डॉ. कलावती राव ने आचार्य विद्वान अतिथि वक्ता डॉ. अजय आर्य का पुष्प कुछ देकर स्वागत किया। प्रभा प्रसाद ने कार्यक्रम का संचालन किया एवं विद्वान वक्ता का परिचय प्रस्तुत किया।
सभा को संबोधित करते हुए डॉक्टर अजय आर्य ने कहा कि मूल्य शिक्षा के बगैर जीवन का कोई मूल्य नहीं है। आप कितनी ही बलवान धनवान ज्ञानवान क्यों ना हो अगर आपके जीवन में मूल्य नहीं है तो आप समाज के लिए उपयोगी या स्वीकार्य नहीं है। जिंदगी क्या है? काटोगे तो उम्र है, जिओगे तो जिंदगी। जब कभी किसी से पूछोगी कैसे हो तो वह जवाब देता है की कट रही है। समझ नहीं आता कि यह जिंदगी के बाद कर रहे हैं कि तिहाड़ जेल की सजा की बात करें। जिंदगी को सजाना और संवारना चाहिए। आपकी स्माइल ही आपका गोल्ड फेशियल है। आप देखिए कि जवाब मुस्कुराते हैं तो आपकी फोटो अच्छी आती है। इसे सोचिए! आप अपने जीवन में जितना मुस्कुराएंगे आपकी जिंदगी उतनी सुंदर होने लगेगी क्योंकि मुस्कुराहट सकारात्मक ऊर्जा देती है। इसलिए मूल्य आरंभ होता है आपकी हंसी से मुस्कान से और खुशी से। दूसरा सूत्र है विनम्र बने रहिए सरल बने रहिए सरस बने रहिए। आजकल डायबिटीज का इतना आतंक है कि सब शुगर फ्री शुगर फ्री हो गए हैं। मैं सबसे कहना चाहता हूं कि आपका खान-पान शुगर फ्री होना चाहिए किंतु जीवन शुगर फ्री नहीं होना चाहिए। जिंदगी में मिठास होनी चाहिए। अब लोग कड़वे होने का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। जिंदगी को आसानी से जीने का दो ही तरीका है। कुछ इस तरह मैंने अपनी जिंदगी आसान कर ली ।किसी को माफ कर दिया किसी से माफी मांग ली। आजकल तो क्लास छठवीं का बच्चा भी झुकना नहीं चाहता। हमारे यहां आदर्श है कि प्रात काल उठि गई रखना था मात पिता गुरु नांवहि माता।। विद्या का जो पहले गुण लिखा गया है वह विनम्रता विद्या ददाति विनयम। अगर आप विनम्र नहीं है तो आप विद्वान भी नहीं हैं। सच्चाई ईमानदारी और सद्भाव को जीवन का हिस्सा बनना जरूरी है। जीवन की परिपक्व अवस्था में लोग आपका रूप नहीं आपका व्यवहार देखते हैं। आप कितनी सुंदर हो अगर आपकी वाणी में मिठास नहीं है, आप दयाल नहीं है विनम्र नहीं है परोपकारी नहीं है, लोगों से बात नहीं करते हैं, अकड़ में रहते हैं तो फिर आपकी सुंदरता किसी काम की नहीं। क्योंकि व्यक्ति का सौंदर्य काम और व्यवहार अधिक याद रहता है। शिक्षा अंतर्निहित क्षमताओं का विकास है। इसलिए दिन में एक बार जरूर अंदर झांकने की कोशिश करनी चाहिए। आप ऐसे दोस्तों से बिल्कुल दूर रहिए जो लोग आपको निराश करते हैं हताश करते हैं। अपने 2- 4 अच्छे दोस्त रहिए जो आशाओं से भरे हैं, ऊर्जा से भरे हैं। गीता कहती है कि अपनी पूजा की थाली आप अपने सत्कर्मों से सजाओ। पंडित बुद्धदेव विद्या अलंकार ने अपनी पुस्तक में लिखा है-जैसे सूर्य उदय हुआ या नहीं यह बात कह कर नहीं बतानी पड़ती, सूरज की गर्मी प्रकाश और ऊर्जा स्वयं इस बात की खबर दे देते हैं। इसी प्रकार कोई व्यक्ति धर्मात्मा है या नहीं यह बात कह कर नहीं बतानी पड़ती उसका परोपकार उसकी तपस्या, उसकी साधना, उसकी संतुष्टि, उसके धर्मात्मा होने की पहचान और प्रशंसा करते हैं। हाथों की शोभा दान से है, सहयोग से है, कंगन से नहीं। जिनके हाथ गिरे हुए को नहीं उठाते वह व्यर्थ हैं, जो पांव लाचार गरीबों तक नहीं पहुंचते वह भी व्यर्थ हैं। सार्थक जीवन वही है जिसमें परोपकार है। जीवन को अमूल्य बनाने के लिए पांच सूत्र अपनाइए - मुस्कुराना कभी मत छोड़िए, विनम्र बनिए, परोपकारी बनिए, खुद के लिए 10 मिनट निकालिए। खुद को सुनो, खुद को सुनाओ। माफी मांगना सीखिए और माफ करना सीखे। जीवन को मूल्यवान बनाना कोई कठिन काम नहीं है।
गीता कहती है कि यह मनुष्य तू अपनी पूजा की थाल अपने सत्कर्मों से सजा। आपके जीवन में आपके कर्म बहुत महत्वपूर्ण है। आचार्य ने चुटकी लेते हुए कहा कि हम लोग बहुत स्वार्थी हो गए हैं। एक बार एक नौकर ने अपने मालिक से कहा कि महाराज रात को आप मेरे सपने में आए थे। मकान मालिक से पूछा आपने मुझे 500 का नोट दिया था। उसके मालिक ने कहा कि कोई बात नहीं मैं आपका वेतन में से 500 रुपए काट लूंगा। हमें यह बात सुनकर की हंसी आती है लेकिन आदमी स्वार्थी है। वह काटने की सोचता है और लेने की सोचता है। जो देने की सोचते हैं वे देवता बन जाते हैं।
प्राचार्य डॉ अलिपा साहू ने कहा - जीवन को भर मत बनाइए आभार के साथ जियो जीवन का आनंद बढ़ जाएगा। मोटिवेशनल स्पीकर डॉ अजय आर्य ने बहुत अच्छ सच्ची और सरल बातें बनाई जिसके द्वारा हम अपने जीवन में मूल्य को जोड़ सकते हैं।
कार्यक्रम के अंत में डॉ अजय आर्य ने प्राचार्य महोदय को अपनी पुस्तक 'नहीं चाहिए मुझे तरक्की' भेंट की।
कार्यक्रम में निदेशक टी आर, साहू, प्राचार्य अलीपा साहू, विभाग अध्यक्ष डॉ. कुलवती राव, डॉ. हेमंत जैन, डॉ. नीलम चौहान प्रभा प्रसाद पूर्णिमा साहू कल्पना गुप्ता सहित शिक्षकों एवं छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।